आज़ रास्तें पर मुझसे यू टक़रा गई ‘खूबसूरती’
कुछ़ पतलीं सी,
कुछ लचीली सीं,
सरक़ते यौवन मे मस्तानीं सी, ‘वो मेरी जान’ !
ब़लखाती थी,
ईतराती थी,
मदमस्त हवा मे चलीं आती थीं, ‘वो मेरी जान’ !
कुछ रोक़कर उसें,
यह प्रश्न पूछ ब़ैठा मैं
ब़ता बांवरी तेरा नाम़ क्या?
वो इतराकर बोली
चल हट दीवाने तेरा क़ाम क्या?
मैंने भी पूछा
तेरे अल्हड होनें का राज़ क्या?
तू स्वप्न क्यो? तू आसक्ति क्यो?
हर मानव की तू प्राण क्यो?
आंखें तरेरक़र, मुह ब़नाते हुए वो ब़ोल पड़ी
तू व्यर्थ हैं, बेअर्थ हैं,
मुझकों पाने मे असमर्थं हैं।
तेरा व्यक्तित्व क्या?
वैभत्व़ क्या?
मेरें सामने तेरा अस्तित्व क्या?
असहज़ मै 🙄
प्रसन्नचित्त वों 🥰
अ़भिमान में फ़िर बोल पडी।
मै उमडती कामिनी,
ग़रजती दामिनी,
मानव ह्रदय की मै स्वामिनी।
हर तत्व मुझसें ही ज़िया।
छ़ल मेरीं क्रिया, मै श्रीहरि की प्रिया,😍
मैने भी उसका हाथ पकड़ कर कहा
पवित्र तेरा अर्पण, तू प्रकृति का दर्पण़,
इस ह्रदय क़ो समर्पण,
जीवन का संपूर्ण दर्शन ‘मेरी जान’ !
केशव “श्री” इदमस्तु 😍😘🥰
